नमस्कार,
राजस्थान में पंच-सरपंच की वोटिंग के दौरान अजब-गजब नजारे दिखे, जिनके हाथ नहीं वे भी बटन दबाने पहुंचे। अजमेर में प्रत्याशी को गुड़ से तौलने के लिए क्रेन पर लटका दिया गया। वहीं सरपंच का चुनाव लड़ रही पत्नी के लिए पतिदेव ने पूरे गांव से माफी मांफी।
राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में…
1. पंचायत चुनाव में जीता वोटिंग का 'जज्बा'
लोकतंत्र की तस्वीर कितनी खूबसूरत है। पंच-सरपंच के दावेदार वोटिंग की तस्वीरें देखें और तय करें कि गांव की जनता की सेवा के लिए जी-जान लगा देंगे।
वोट डालने का जज्बा ऐसा कि 91 साल के दादा अपने पोते की पीठ पर लदकर बूथ तक पहुंचे। कहीं कोई अम्मा को गोद में उठाकर मतदान केंद्र ले जा रहा था।
जिनसे चला-फिरा नहीं जाता, उन बुजुर्गों का जज्बा ऐसा कि पहिये वाली कुर्सी पर बैठकर EVM का बटन दबाने पहुंचे, ताकि पंच-सरपंच की कुर्सी पर सही आदमी बैठे।
अलवर के रामगढ़ की बाम्बोली ग्राम पंचायत में तो हैरान करने वाला नजारा दिखा। बटन दबाने प्रहलाद भी पहुंचे। उनके दोनों हाथ नहीं। तो बटन दबाएंगे कैसे? जवाब था- भतीजे की मदद से।
गांव का मुद्दा पूछा तो बोले- पानी की टंकी और सड़क नहीं है, इसीलिए वोट डालने आया हूं। ऐसे वोटर का तो तिलक होना चाहिए। इन्हीं की बदौलत लोकतंत्र भारत के आमजन की सेवा कर पा रहा है। धन्य हो।
2. माप-तौल का 'अभियान'
हाल ही राजस्थान में विधिक माप विज्ञान विभाग की ओर से एक अभियान चला। भारी वाहनों को तौलने वाले धर्मकांटों की चेकिंग की गई।
टोल प्लाजा से लेकर मंडियों और जगह-जगह बने धर्मकांटों पर भारी वाहनों को तौलने का काम सही ढंग से हो रहा है या नहीं, यही चेक किया गया।
कई धर्मकांटे ऐसे मिले जिनका वैध सत्यापन नहीं था। कुछ ऐसे थे जिन्होंने छेड़छाड़-फर्जीवाड़ा कर रखा था। कुछ ने नियमों का पालन नहीं किया था। ऐसों पर जुर्माना ठोका गया।
चुनाव के मौसम में कई भारी वाहन वोट के लिए भी घूम रहे हैं। जनता को इनकी तुलाई भी अपने फैसले के धर्मकांटे पर करनी है। फैसले का बटन तौल पर खरा पाए जाने पर ही दबना चाहिए।
अजमेर की सिलोरा ग्राम पंचायत के वार्ड 17 से उम्मीदवार चैनाराम टिकावड़ा गांव पहुंचे। वहां स्वागत की तैयारी थी। गांव में RLP प्रमुख और नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल का काफी असर है। स्वागत करने वाले बोले- आपको तौलेंगे।
उम्मीदवार खुश। उसे लगा कि किसी तराजू में बैठाया जाएगा। तुलाई स्थल पर पहुंचे तो क्रेन खड़ी थी। तराजू को क्रेन पर बांधा गया था। एक पलड़े में गुड़ भरा था।
दूसरे पलड़े की ओर इशारा कर गांव वाले बोले- बैठो। क्रेन को हवा में कितना ऊपर लेकर जाएंगे, यही सोचकर उम्मीदवार के मन में धकड़-पकड़ मची रही।
वोट के लिए उसने भी ऊखल में सिर डाल ही दिया और पलड़े पर बैठ गया। क्रेन ऊपर उठी, उम्मीदवार साहब हवा में झूलने लगे। इस बार जनता उम्मीदवार को परखने-तौलने का यह तरीका भी आजमा रही है।
3. बस्ती पर 'डाउट' हो रहा है
उनका नाम मोहन सिंह रावत है। वे अजमेर की खोड़ा ग्राम पंचायत में दबदबा रखते हैं। पुराने और मंझे हुए नेता हैं। गांव की रग-रग समझते हैं। इस बार उनकी पत्नी कमला देवी मैदान में थी।
मोहन सिंह गांव के मंदिर में हुई सभा में पहुंचे। वोटिंग से ठीक पहले राजनीतिक अनुभव का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने पूरा जोर लगाया। बोले- ये गांव तन-मन-धन से हमेशा मेरे साथ खड़ा रहा। लेकिन इस बार बस्ती पर डाउट हो रहा है।
बस्ती में सन्नाटा पसर गया। लोग एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। मोहन सिंह बोले- मैं बस्ती को जोड़ने की कोशिश कर रहा हूं। बस्ती कुछ बिखरी सी महसूस हो रही है। इस बात का दुख है।
मेरी पत्नी मैदान में है। ये आखिरी बार है। इसके बाद आगे मैं या मेरा कोई परिवार वाला, यार दोस्त चुनाव नहीं लड़ेंगे। गांव के लिए गर्दन कटा सकता हूं। मेरे बारे में कोई अफवाह फैला रहा है। मंदिर में खड़ा हूं। आगे से आपसे सीट नहीं मांगूंगा।
अगर मेरी गलती है तो आपके पैर पकड़ सकता हूं, हाथ जोड़ सकता हूं, माफी मांग सकता हूं। बस्तीवालों का कुछ यकीन बंधा और तालियां गूंजने लगीं।
4. चलते-चलते...
डिग्गी मालपुरा कल्याणजी का धाम है। टोंक जिले में है। यहां उप तहसील कार्यालय के पास आकर लोग ठिठक जाते हैं।
होने को तो तहसील दफ्तर में वही सरकारी काम-काज होते हैं जो सब दफ्तरों में होते हैं, लेकिन यहां ठिठकने की वजह है अबाबील पंछियों की बस्ती।
अबाबीलें झुंड में रहती हैं। गोलाई में तेजी से मंडराती हैं। हवा में उड़ने वाले कीट-पतंगे खाती हैं। इंसान के बाद यही पक्षी हैं तो करीने से अपना आशियाना बनाते हैं।
इनके घरौंदे तालाब की चिकनी मिट्टी के बने होते हैं। काली छोटी चिड़ियाएं तालाब से चोंचभर चिकनी मिट्टी लाती हैं और एक साथ सैकड़ों की तादाद में ये घोंसले बनाना शुरू करती है।
सुराही के आकार के सुंदर घरौंदों के अंदर मखमली अस्तर लगाती हैं। ये उसी जगह अपना घोंसला बनाती हैं जहां से इनके उजड़ने की संभावना कम होती है।
इसलिए प्राय: पुराने किले की सुरक्षित दीवार, बड़ी इमारतों के कोनों, मेहराब, छज्जों पर इनकी बस्ती होती है। टोंक के मालपुरा में सरकारी तहसील दफ्तर के छज्जे पर इन चिड़ियाओं ने बस्ती बसा रखी है।
तहसील दफ्तर के अफसर अब सीना चौड़ा करके ‘आवासीय योजना’ के सफल संचालन पर व्याख्यान दे सकते हैं। बाकी मेहनतकश चिड़ियाओं पर कल्याणजी की कृपा तो है ही।
इनपुट सहयोग- जयदीप पुरोहित (जोधपुर), मुकेश सोनी (कोटा), मुकेश हिंगड़ (उदयपुर), सुनील जैन (अजमेर), धर्मेंद्र यादव, सिराज शेख (अलवर), योगेश शर्मा (रामगढ़, अलवर), रईस पठान (इटावा,कोटा)।