न्यूयॉर्क। भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में वीटो को लेकर अपना मत स्पष्ट किया है। भारतीय प्रतिनिधि ने 'डी फैक्टो वीटो' की आलोचना करते हुए कहा कि वीटो अधिकार का नहीं बल्कि जिम्मेदारी का एहसास कराता है। सोमवार को महासभा में पांच स्थायी सदस्यों (पी5) के वीटो अधिकारों पर हुई बहस के दौरान, संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने बताया कि सुरक्षा परिषद में सुधार के लिए 'इंटरगवर्नमेंटल नेगोशिएशन्स' (आईजीएन) के तहत यह एक अहम मुद्दा था, लेकिन कुछ देशों ने 'अप्रत्यक्ष वीटो' का इस्तेमाल किया जिससे ये प्रक्रिया अटक गई है। उन्होंने कहा, आईजीएन प्रक्रिया में भी 'आम सहमति' की दलील का इस्तेमाल एक डी फैक्टो वीटो (छिपे हुए) के रूप में किया जा रहा है।

भारत के अनुसार, वीटो पावर का विशेषाधिकार किसी संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ को साधने का साधन नहीं बनना चाहिए।
'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' नाम के देशों के एक छोटे समूह ने प्रक्रिया संबंधी पैंतरों का इस्तेमाल करके आईजीएन को बातचीत के लिए कोई मसौदा अपनाने से रोक दिया है। इस समूह का नेतृत्व इटली कर रहा है और इसमें पाकिस्तान भी शामिल है।

हरीश ने कहा कि 2008 का महासभा प्रस्ताव, जो आईजीएन के लिए आधारभूत निर्णय है, बिल्कुल स्पष्ट है: इसका मुख्य सिद्धांत 'अधिकतम राजनीतिक स्वीकृति' है, न कि 'आम सहमति'। उन्होंने बताया कि बातचीत के 17 दौर पूरे होने के बाद भी, हमारे पास दिखाने के लिए कोई नतीजा नहीं है। इसका कारण वह 'व्यावहारिक वीटो' है, जिसका आईजीएन को बनाने वाले प्रस्ताव में कोई आधार नहीं है।