30 साल बाद प्रमोशन मिला। 1 महीना 19 दिन CMO रहा, लेकिन कुर्सी पर नहीं बैठ सका। इसका मलाल जिंदगी भर रहेगा।

छतरपुर नगर पालिका से हाल ही में रिटायर हुए लखनलाल तिवारी को 30 साल के इंतजार के बाद CMO पद पर प्रमोशन मिला, लेकिन वे इस पद पर काम नहीं कर सके।
मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग में 63 अधिकारियों-कर्मचारियों को CMO पद पर पदोन्नत किया गया, लेकिन उनकी पोस्टिंग के आदेश जारी नहीं हुए। पिछले दो-तीन महीनों से इंतजार कर रहे इन अधिकारियों में से 3 बिना CMO का प्रभार संभाले रिटायर हो गए।
कुछ अन्य अधिकारी भी इसी महीने रिटायर होने वाले हैं। भास्कर की पड़ताल के मुताबिक, पोस्टिंग की फाइल मंत्रालय में अटकी है। सूत्रों का दावा है कि इस देरी के पीछे स्थानीय नेताओं के राजनीतिक दबाव की भूमिका है।
आखिर नेताओं को प्रभारी व्यवस्था क्यों पसंद है और इसका निकायों के कामकाज पर क्या असर पड़ रहा है? पढ़िए मंडे स्टोरी।
केस 1: प्रमोशन के बाद 2 महीने 8 दिन तक नहीं मिला प्रभार
सौंसर नगर परिषद के राजू वाड़ेकर को 5 जून 2026 को CMO पद पर प्रमोशन मिला। उन्होंने 13 जून को जॉइनिंग दी, लेकिन पोस्टिंग का आदेश जारी नहीं हुआ। पदोन्नति के बावजूद वे पुराना काम करते रहे। 21 अगस्त को वे बिना CMO का प्रभार संभाले रिटायर हो गए।
केस 2: 30 साल बाद प्रमोशन, लेकिन CMO का प्रभार नहीं मिला
छतरपुर के लखनलाल तिवारी ने 1986 में क्लर्क के रूप में नौकरी शुरू की। 1996 में वे मुख्य लिपिक और लेखापाल बने। उनके मुताबिक, नियमानुसार पांच साल बाद वे CMO पद के लिए पात्र हो गए थे, लेकिन प्रमोशन में करीब 30 साल लग गए।
12 जुलाई को उन्हें CMO पद पर पदोन्नत किया गया, पर डेढ़ महीने तक पोस्टिंग का आदेश नहीं आया। वे लेखापाल का काम करते हुए ही रिटायर हो गए।
प्रदेश के 42% नगरीय निकाय प्रभारी CMO के भरोसे
प्रदेश के 397 नगरीय निकायों में से 165 में नियमित CMO नहीं हैं। इनमें 24 नगर पालिका और 141 नगर परिषद शामिल हैं। यानी करीब 42% निकाय प्रभारी CMO के भरोसे चल रहे हैं। दूसरी ओर, पदोन्नति पाने वाले अधिकारी बिना प्रभार संभाले ही रिटायर हो रहे हैं।
क्लर्क, लेखापाल और राजस्व कर्मचारी संभाल रहे CMO का प्रभार
जिन 165 निकायों में नियमित CMO नहीं हैं, वहां राजस्व निरीक्षक (RI), राजस्व उपनिरीक्षक, सहायक ग्रेड-1, लेखापाल, मुख्य लिपिक और कार्यालय अधीक्षक जैसे कर्मचारियों को अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
अमरकंटक में राजस्व उपनिरीक्षक CMO का प्रभार संभाल रहे हैं। बैरसिया में लेखापाल, अमरवाड़ा और सिरोंज में सहायक ग्रेड-1, जबकि गंजबासौदा में मुख्य लिपिक के पास यह जिम्मेदारी है।
असर: विकास कार्यों में देरी, प्रशासनिक नियंत्रण पर सवाल
नाम न बताने की शर्त पर नगरीय प्रशासन विभाग के अफसर ने कहा कि नियमित CMO की कमी से शहरी विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने इसके दो असर बताए…
योजनाओं की निगरानी प्रभावित: नियमित CMO नहीं होने से जलापूर्ति, सीवरेज, स्वच्छ भारत मिशन, अमृत योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़ी परियोजनाओं की निगरानी और फाइलों के निपटारे में देरी हो रही है।
प्रशासनिक नियंत्रण की चुनौती: नियमों के तहत CMO को कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के अधिकार मिलते हैं। लेकिन जब तृतीय श्रेणी का कर्मचारी या दैनिक वेतनभोगी प्रभारी CMO बनता है, तो उसके लिए अधीनस्थ अमले पर प्रभावी नियंत्रण रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
63 CMO की पोस्टिंग का आदेश मंत्रालय में क्यों अटका?
भास्कर की पड़ताल के मुताबिक, नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने 63 पदोन्नत अधिकारियों की पोस्टिंग का प्रस्ताव मंत्रालय भेजा था।
हालांकि, पोस्टिंग के आदेश जारी नहीं हुए। सूत्रों का दावा है कि देरी के पीछे प्रशासनिक कारणों के साथ राजनीतिक दबाव भी है।
उनका कहना है कि कुछ स्थानीय नेता और जनप्रतिनिधि निकायों में प्रभारी CMO की व्यवस्था जारी रखना चाहते हैं।
तृतीय श्रेणी के कर्मचारी-जैसे क्लर्क, लेखापाल और राजस्व निरीक्षक जब प्रभारी CMO बनते हैं, तो स्थानीय जनप्रतिनिधियों के लिए उन पर दबाव बनाना आसान हो जाता है।
नियमित CMO जनप्रतिनिधियों के बेवजह के दबाव को ज्यादा सहन नहीं करते।